3 septmber 2021, 19:47

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कहा है की सविधान मे दी गई अभिव्यक्ति की आजादी का पालन होना चाहिए , लेकिन इस अधिकार का दुरूपयोग सोशल मीडिया पर करना अपराध समझा जाएग एवं इसकी रिपोर्ट की जाएगीा कुछ यूट्यूब चैनल और वेब पोर्टल स्वतंत्र रूप से बोलने का दुरूपयोग नकली समाचार प्रसारित करने के लिए और साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए करते है, जिससे देश का नाम बदनाम होता है. मुख्य न्यायाधीश एनवी रमनाने कहा, “प्रिंट और टेलीविजन मीडिया आम तौर पर जिम्मेदार होते हैं और सुधार करने के लिए एक नियामक तंत्र होता है। लेकिन मीडिया के एक वर्ग, विशेष रूप से वेब-आधारित, में जो कुछ भी दिखाया जाता है, वह सांप्रदायिक रंग ले लेता है। कोई नियंत्रण नहीं है”।

जमीयत -उलमा-आ- हिन्द द्वारा एक साल पहले उच्चतम न्यायलय मैं दाखिल की गई याचिका पर दोबारा सुनवाई के दौरान न्यायधीश एनवी रमना , न्यायधीश सूर्यकांत , न्यायाधीश एएस बोपात्र की पीठ ने तब्लीगी मरकज को बदनाम करने के लिए फर्जी समाचार और भेदभावपूर्ण रिपोर्टिंग की आलोचना की और ऐसे गैर-जिम्मेदार और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने और साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए प्रेरित रिपोर्टिंग में शामिल वेब पोर्टल एवं वेब चैनल्स पर शिकंजा कसा, “वेब पोर्टलों और यूट्यूब चैनलों द्वारा फर्जी खबरों और बदनामी पर कोई नियामक नियंत्रण नहीं है। वे सत्यापन या तथ्यों पर ध्यान दिए बिना कुछ भी प्रकाशित कर सकते हैं। यदि आप यूट्यूब पर जाते हैं, तो नकली समाचार प्रसारित करने वाले कई चैनल हैं। कोई भी एक शुरू कर सकता है YouTube चैनल और जो कुछ भी वे चाहते हैं प्रसारित करें। इन चैनलों और पोर्टलों के लिए कोई नियामक तंत्र नहीं है, “सीजेआई ने कहा.

सीजेआई ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा है कि, तुषार मेहता क्या केंद्र सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन जो लोग कर रहे है, उनके खिलाफ कोई नियम एवं कानून लागु किया गया है. मेहता ने कहा, “असली मुकाबला बोलने की स्वतंत्रता और नागरिकों के सही समाचार और सूचना प्राप्त करने के अधिकार के बीच है। नए कहा है कि के निर्माण के माध्यम से सूचना और प्रौद्योगिकीनियमों के अनुसार, हमने मीडिया के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और नागरिकों के सही सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। नियम मुख्य रूप से नकली समाचारों के प्रसार को रोकने और वेब पोर्टलों और चैनलों को उनके द्वारा प्रसारित सामग्री के लिए जवाबदेह ठहराने का इरादा रखते हैं।

SG ने उच्चतम न्यायालय से दरखास्त करते हुए कहा है कि सभी उच्च न्यायालय में निलंबित सभी याचिकाओं को हाई कोर्ट में स्तथान्तरित किया जाये जो अनुसूचित जाति, मीडिया के बोलने के स्वतंत्रता के अधिकार, और सही समाचारो के नागरिकों के अधिकार को प्रभावित करने वाले नियमो की वैधता पर दाखिल की गयी थी. इन् याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट एक आधिकारिक निर्णय ले ताकि सभी के अधिकारों की सुरक्षा हो सके.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की चिंता अभी पूरी तरह से वेब पोर्टल एवं चैनल्स को लेकर खत्म नही हुई है वे कहते है की “वे न्यायाधीशों, संस्थानों और जिन्हें वे नापसंद करते हैं उनके खिलाफ अपशब्द लिखते हैं। और जब उनकी रिपोर्ट के लिए जवाबदेही लेने के लिए कहा जाता है, तो वे कभी जवाब नहीं देते। वे कहते हैं कि उन्हें जो कुछ भी वे चाहते हैं उन्हें प्रकाशित करने का अधिकार है। इसका कोई नियंत्रण नहीं है।”

मेहता कहते है की सोशल मीडिया के एक तबके मे गलत व् फर्जी समाचारों के जरिये से लोगो वह कुछ संस्थाओं की भूमिका बिगाड़ने की कोसिस बढ़ रही है, “नए आईटी नियमों के माध्यम से, सरकार का इरादा मीडिया और उनके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली रिपोर्टों पर जवाबदेही तय करना है। हमने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समाचारों को सही करने के अधिकार के बीच एक त्रि-स्तरीय तंत्र के माध्यम से संतुलन बनाने का प्रयास किया है। सबसे पहले, पीड़ित व्यक्ति संबंधित मीडिया को शिकायत कर सकता है; दूसरा, मीडिया को सुधारात्मक उपाय करने या 15 दिनों के भीतर शिकायत का जवाब देने के लिए अनिवार्य है; तीसरा, यदि कोई सुधारात्मक उपाय नहीं किया जाता है या शिकायत 15 दिनों से अधिक समय तक अनसुनी रहती है, तो अधिकारी पहल कर सकते हैं कार्यवाही, “उन्होंने कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने SG से निश्चित करने के लिए कहा है की केंद्र सरकार को 2 हफ्ते मे अपना जवाब दायर करे, जिससे फर्जी खबरों और गैर जिम्मेदार रिपोर्टिंग को बंद करने के लिए उठाये गये कदमों क उल्लेख हो.साथ ही यह भी की वह जमीयत-उलमा द्वारा दाखिल मुख्य याचिका के साथ नए नियमों को चुनौती देने वाली उच्च न्यायालय मैं दायर सभी याचिकाओं को उच्चतम न्यायालय में भेजने के लिए केंद्र की याचिका को सूचीबद्ध करेंगे.

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