परमात्मा शरीर के अंदर है और अंदर ही उससे मिलाप किया जा सकता है । बाहर न कभी किसी को परमात्मा मिला है और न मिल ही सकता है । हर मनुष्य के शरीर की बनावट समान है , हर जीव की मूल प्रकृति भी समान ही है । सभी जीवों के लिए परमात्मा से मिलाप का एक ही अनादि साधन और मार्ग है जो प्रत्येक जीव के अपने अंदर है ।

परमात्मा की प्राप्ति के लिए सबसे पहली जरूरत यह है कि मनुष्य बाह्यमुखी के स्थान पर अंतर्मुखी हो जाए । कबीर साहब कहते हैं कि जो आत्मा रूपी स्त्री नौ द्वारों वाले घर ( शरीर ) में ही भूली फिरती है , वह उस प्रभु रूपी अनमोल पदार्थ को नही पा सकती । जब वह नौ द्वारों को वश में कर लेगी तब जाके दसवें द्वार में पहुंचकर अपने असली तत्व में समा जाएगी –

नउ घर देखि जु कामनि भूली बसतु अनूप न पाई ।।

कहत कबीर नवै घर मूसे दसवैं ततु समाई ।।

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धन्यवाद

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